कुछ पल कुछ देर के लिए...
सोचता हु शर्मिंदा हु मैं...
और फिर देर बाद जब निकलता हु सड़क पर....
तो एहसास होता है कि
शर्मिंदगी हेवानियत का लबादा ओड़े खड़ी थी....
शर्मिंदगी और हैवानियत को पह्चानना य़ू तो मुश्किल ना था लेकिन...
शर्मिंदगी कंहा समझ आती जब हैवानियत चारों ओर खड़ी थी...
यू तो ऐसे रामसिंह और पवन उसको रोज़ मिलते होंगे शायद...
लेकिन बदकिस्मत वो दामिनी जिसकी किस्मत इस समाज में गड़ी थी ...
और ताज्जुब तो तब होता है जब कह दिया जाता उनको बिग बॉस और फेसबुक वाली भीड़
जो तुमसे ही लड़कर तुम्हारी बहु बेटियों की इज्ज़त लिए लड़ी थी।
गुनाहगार तो मैं भी हु उस बलात्कारी मौत का क्यूंकि
मैं नज़र फेर चला था तब जब नज़र उस दरिंदगी पर पड़ी थी
अब सियासती गलियारों और वतन के रहनुमाओ को कोसता फिरता हु तब
सोचता हु शर्मिंदा हु मैं...
और फिर देर बाद जब निकलता हु सड़क पर....
तो एहसास होता है कि
शर्मिंदगी हेवानियत का लबादा ओड़े खड़ी थी....
शर्मिंदगी और हैवानियत को पह्चानना य़ू तो मुश्किल ना था लेकिन...
शर्मिंदगी कंहा समझ आती जब हैवानियत चारों ओर खड़ी थी...
यू तो ऐसे रामसिंह और पवन उसको रोज़ मिलते होंगे शायद...
लेकिन बदकिस्मत वो दामिनी जिसकी किस्मत इस समाज में गड़ी थी ...
और ताज्जुब तो तब होता है जब कह दिया जाता उनको बिग बॉस और फेसबुक वाली भीड़
जो तुमसे ही लड़कर तुम्हारी बहु बेटियों की इज्ज़त लिए लड़ी थी।
गुनाहगार तो मैं भी हु उस बलात्कारी मौत का क्यूंकि
मैं नज़र फेर चला था तब जब नज़र उस दरिंदगी पर पड़ी थी
अब सियासती गलियारों और वतन के रहनुमाओ को कोसता फिरता हु तब
जब उसकी चीख सुनकर सोचा था मुझे क्या पड़ी थी...
No comments:
Post a Comment